परमेश्वर कबीर जी से चम्पाकली ने पूछा कि हे भगवान! इस पाप की संपत्ति और रूपये का क्या करूं? परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि बेटी! इस नरक के धन को दान कर दे। घर पर जाकर चम्पाकली ने विचार किया कि यदि सर्व धन दान कर दिया तो खाऊँगी क्या? कोई कार्य और है नहीं। चम्पाकली सत्संग अधिक समय जाने लगी। एक दिन सत्संग में बताया गया कि:-
रंका (पुरूष) तथा बंका (स्त्री) परमात्मा के परम भक्त थे। तत्वज्ञान को ठीक से समझा था। उसी आधार से अपना जीवन यापन कर रहे थे। उनकी एक बेटी थी जिसका नाम अबंका था। एक दिन नामदेव भक्त ने अपने गुरू जी से कहा कि गुरूदेव आपके भक्त रंका व बंका बहुत निर्धन हैं। आप उन्हें कुछ धन दे दो तो उनको जंगल से लकडियाँ लाकर शहर में बेचकर निर्वाह न करना पड़े। दोनों जंगल में जाते हैं। लकड़ियाँ चुगकर लाते हैं। भोजन का काम कठिनता से चलता है। गुरूदेव बोले, भाई! मैंने कई बार धन देने की कोशिश की है, परंतु ये सब दान कर देते हैं। दो-तीन बार तो मैं स्वयं वेश बदलकर लकड़ी खरीदने वाला बनकर गया हूँं। उनकी लकड़ियों की कीमत अन्य से सौ गुणा अधिक दी थी। उनकी लकड़ियाँ प्रतिदिन दो-दो आन्ना की बिकती थी। मैंने दस रूपये में खरीदी थी। उन्होंने चार आन्ना रखकर शेष रूपये मेरे को सत्संग में दान कर दिए। अब आप बताओ कि कैसे धन दूँ? भक्त नामदेव जी ने फिर आग्रह किया कि अबकी बार धन देकर देखो, अवश्य लेंगे। गुरू तथा नामदेव जी उस रास्ते पर गए जिस रास्ते से रंका-बंका लकड़ी लेकर जंगल से आते थे। गुरू जी ने रास्ते में सोने (Gold) के बहुत सारे आभूषण डाल दिए जो लाखों रूपयों की कीमत के थे। नामदेव तथा गुरूदेव एक झाड़ के पीछे छिपकर खड़े हो गए। रंका आगे-आगे चल रहा था सिर पर लकडियाँ रखकर तथा उसके पीछे लकडियाँ लेकर बंका दो सौ फुट के अंतर में चल रही थी। भक्त रंका जी ने देखा कि स्वर्ण आभूषण बेशकीमती हैं और बंका नारी जाति है, कहीं आभूषणों को देखकर लालच आ जाए और अपना धर्म-कर्म खराब कर ले। इसलिए पैरों से उन आभूषणों पर मिट्टी डालने लगा। भक्तमति बंका भी पूरे गुरू की चेली थी। उसने देखा कि पतिदेव गहनों पर मिट्टी डाल रहा है, उद्देश्य भी जान गई। आवाज लगाकर बोली कि चलो भक्त जी! क्यों मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो। रंका जी समझ गए कि इरादे की पक्की है, कच्ची नहीं है। दोनों उस लाखों के धन का उल्लंघन करके नगर को चले गए। गुरू जी ने कहा कि देख लिया भक्त नामदेव जी! भक्त हों तो ऐसे।
एक दिन शाम 4 बजे गुरू जी सत्संग कर रहे थे। सत्संग स्थल रंका जी की झोंपड़ी से चार एकड़ की दूरी पर था। रंका तथा बंका दोनों सत्संग सुनने गए हुए थे। उनकी बेटी अबंका (आयु 19 वर्ष) झोंपड़ी के बाहर चारपाई पर बैठी थी। झोंपड़ी में आग लग गई। सब सामान जल गया। अबंका दौड़ी-दौड़ी आई और देखा कि सत्संग चल रहा था। गुरू जी सत्संग सुना रहे थे। श्रोता विशेष ध्यान से सत्संग सुनने में मग्न थे। शांति छायी थी। अबंका ने जोर-जोर से कहा कि माता जी! झोंपड़ी में आग लग गई। सब सामान जल गया। माता बंका उठी और बेटी को एक ओर ले गई और पूछा कि क्या बचा है? बेटी अबंका ने बताया कि एक चारपाई बाहर थी, वही बची है। भक्त रंका भी उठकर आ गया था। दोनों ने कहा कि बेटी! उस चारपाई को भी आग के हवाले करके आजा, सत्संग सुन ले। झोंपड़ी नहीं होती तो आग नहीं लगती, आग नहीं लगती तो सत्संग के वचनों का आनंद भंग नहीं होता। अबंका गई और चारपाई को झोंपड़ी वाली आग में डालकर सत्संग सुनने आ गई। सत्संग के पश्चात् घर गए। उस समय का खाना सत्संग में लंगर में खा लिया था। रात्रि में जली झोंपड़ी के पास एक पेड़ के नीचे बिना बिछाए सो गए। भक्ति करने के लिए वक्त से उठे तो उनके ऊपर सुंदर झोंपड़ी थी तथा सर्व बर्तन तथा आटा-दाल आदि-आदि मिट्टी के घड़ों में भरा था। उसी समय आकाशवाणी हुई कि भक्त परिवार! यह परमात्मा की मेहर है। आप इस झोंपड़ी में रहो, यह आज्ञा है गुरूदेव की। तीनों प्राणियों ने कहा कि जो आज्ञा गुरूदेव! सूर्योदय हुआ तो नगर के व्यक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि जो झोंपड़ी दूसरे वृक्ष के साथ डली थी, उस पुरानी की राख पड़ी थी। नई झोंपड़ी एक सप्ताह से पहले बन नहीं सकती थी। सबने कहा कि यह तो इनके गुरू जी का चमत्कार है। नगर के लोग देखें और गुरू जी से दीक्षा लेने का संकल्प करने लगे। हजारों नगरवासियों ने दीक्षा ली। (यह सब लीला परमेश्वर कबीर जी ने काशी शहर में प्रकट होने से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व की थी। उस समय भक्त नामदेव जी को भी शरण में लिया था।)
उपरोक्त कथा प्रसंग सुनकर भक्तमति चम्पाकली के मन का भय समाप्त हो गया और सर्व सम्पत्ति तथा धन परमात्मा कबीर गुरू जी को समर्पित कर दिया। परमात्मा ने कहा कि बेटी! जब तू ही मेरी हो गई तो सम्पत्ति तो अपने आप ही मेरी हो गई। इस मेरी सम्पत्ति को उतनी रख ले जितने में तेरा निर्वाह चले, शेष दान करती रह। भक्तमति चम्पाकली ने वैसा ही किया। मकान रख लिया और अधिकतर रूपये गुरू जी की आज्ञानुसार भोजन-भण्डारे (लंगर) में दान कर दिए।
सूक्ष्म वेद के अनुसार धन दान करने से पापों का नाश होता है। इसके अलावा पाप कर्मों से कमाए गए धन से छुटकारा पाने का भी यह एक तरीका है।
रंका और बंका को ईश्वर का सर्वोच्च भक्त माना जाता है क्योंकि वह सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर भक्ति किया करते थे। वह एक साधारण जीवन जीते थे और अपनी कमाई में से दान भी देते थे। इसके अलावा उन्होंने मोक्ष प्राप्त करने और ईश्वर की पूजा भक्ति करने में अपना सारा जीवन लगा दिया था।
रंका और बंका ने ईश्वर के द्वारा दी गई संपत्ति को दान कर दिया था। इससे यह भी पता चलता है कि इतना धन होने के बावजूद भी उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं था और उनकी ईश्वर में अटूट श्रद्धा थी।
रंका और बंका ने कीमती आभूषणों को मिट्टी के समान समझा। फिर उन्होंने उन आभूषणों पर मिट्टी डाल दी थी जिससे उनके आध्यात्मिक मार्ग में वह आभूषण कोई बाधा उत्पन्न न करें।
रंका और बंका की झोपड़ी में आग लगने से उनकी सारी संपत्ति जलकर राख हो गई थी। लेकिन उन्होंने इसका कोई अफसोस नहीं किया बल्कि उन्होंने अपना सारा ध्यान सत्संग सुनने में ही केंद्रित किया। इतना ही नहीं जब बेटी ने झोंपड़ी जलने की घटना आकर बताई और कहा कि केवल एक खाट ही बची है जिस पर मैं बैठी थी बाकी सब कुछ जल गया है तो उन्होंने बेटी से वह बची हुई खाट भी आग में डाल देने को कहा क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि बेकार की चिंता में गुरु जी के सत्संग से ध्यान हटे। इसके बाद रंका, बंका और अबंका ने सारा सत्संग ध्यानपूर्वक सुना। इससे यह भी पता चलता है कि उनकी ईश्वर के प्रति बहुत गहरी आस्था थी।
झोपड़ी में आग लगने के बाद अगली सुबह रंका और और अबंका ने देखा कि उनके ऊपर नई झोपड़ी बनी हुई है। इतना ही नहीं झोपड़ी में सभी ज़रूरी बर्तन और खाने-पीने की चीज़ें भी रखी हुई थीं। यह चमत्कार अपने आप में एक बहुत बड़ी घटना थी। उसके बाद रंका, बंका और अबंका के साथ हुए चमत्कार को देखकर हज़ारों शहरवासियों ने भी गुरु जी से नाम दीक्षा ली थी।
रंका और बंका की कहानी सुनने के बाद चंपाकली ने अपनी पूरी संपत्ति परमेश्वर कबीर जी यानि कि अपने गुरु जी को दान कर दी थी। फिर चंपाकली ने उनके बताए सतमार्ग पर चलकर अपना जीवन व्यतीत किया। चंपाकली ने केवल अपने भरण-पोषण के लिए आवश्यक धन रखकर बाकी का धन भी दान कर दिया था।
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Raghav Saini
दान देने की प्रथा मेरी चिंता का विषय है। इतनी महंगाई में हमारी रोज़ाना के जीवन की जरूरतों पर ही बहुत खर्च हो जाता है। उसके बाद बहुत कम धन बचता है और इस तरह नियमित रूप से दान करना कठिन कार्य हो जाता है। भक्तों द्वारा दान किए धन की राशि कैसे और कहां इस्तेमाल की जाती है इसके बारे में भी कोई स्पष्टीकरण नहीं है। इसलिए मैं दान करने जैसे कार्यों से दूर ही रहता हूं।
Satlok Ashram
राघव जी, आप ने हमारे लेख में रूचि दिखाई इसके लिए हम आपके आभारी हैं। लेकिन यह याद रखना भी जरूरी है कि हम जितना दान करते हैं, उसका कई गुना होकर हमें वापस मिलता है। यह बात बहुत से प्रसिद्ध संतों की बाणियों से भी सिद्ध हो चुकी है। कबीर जी कहते हैं, दान दिए धन घटे नहीं। लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है कि कुछ संत अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए भक्तों द्वारा दिए गए दान का दुरुपयोग करते हैं। संत रामपाल जी महाराज जी विश्व में एकमात्र ऐसे संत हैं जो व्यक्ति को दान करने और अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। संत रामपाल जी के बहुत से अनुयायी उनके बताए हुए सतमार्ग पर चलकर आर्थिक रूप से मज़बूत हुए हैं। भक्तों द्वारा दान किए गए धन का सदुपयोग आश्रम के निर्माण कार्यों, भंडारे की व्यवस्था करने, गद्दे, मैट, रजाइयों, दवाइयों, वाहनों इत्यादि पर किया जाता है। दान की राशि के एक एक पैसे का लेखा रखा जाता है। अधिक जानकारी के लिए आप किसी भी सतलोक आश्रम को देखकर आएं तथा वहां उपस्थित भक्तों से मिलें व पूछ भी सकते हैं।