पूर्ण परमात्मा में प्रेम, क्षमा, त्याग, आधीनता आदि अनेकों गुण सूक्ष्म वेद में बताए गए हैं। ऐसे ही गुण मोक्ष के लिए साधक में होने आवश्यक हैं। सबसे प्रेम व्यवहार करने वाला, क्षमा, त्याग और दया की भावना से भरपूर साधक ही परमात्मा को पसंद आ सकता है। अहंकार से परमात्मा कोसों दूर है किंतु वहीं विनम्र व्यक्ति के परमात्मा पास है।
यह आलेख एक परम भक्त विभीषण और उसकी कथा को स्पष्ट करता है। विभीषण को गुरु रूप में त्रेतायुग में तत्वदर्शी संत के रूप में मुनींद्र ऋषि मिले थे। मुनींद्र ऋषि के रूप में स्वयं परम ब्रह्म कबीर साहेब जी आए थे। तो आइए जानते हैं आधीन भक्त विभीषण का उद्धार परमात्मा ने कैसे किया।
त्रेतायुग में लंकापति रावण के छोटे भ्राता (भाई) का नाम विभीषण था। विभीषण एक महान और पवित्र आत्मा थे। उनमें बहुत अच्छा दास भाव था। उन्होंने तत्वदर्शी संत मुनींद्र ऋषि की शरण में मोक्ष प्राप्त किया था। विभीषण पुल्तस्य वंश से संबंध रखने वाले ब्राह्मण थे, जिनकी माता कैकेसी राक्षस वंश से थी। इसके बाद भी विभीषण में दया, अधीनता, दास भाव जैसे गुण विद्यमान थे।
रामायण में यह तथ्य आता है कि विभीषण, अपने भाई रावण की हार एवं मृत्यु के पश्चात लंका के राजा बने थे। स्वयं भगवान राम ने उनका राज्याभिषेक किया था। विभीषण अपने अन्य राक्षस प्रवृत्ति के भाईयों यथा कुंभकर्ण आदि के विपरीत परम अक्षर ब्रह्म यानी पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की शास्त्रानुसार सत्यभक्ति किया करते थे। जबकि कुंभकर्ण आदि मनमाना आचरण, हठयोग जैसी क्रियाएं करते और भगवान शिव को पूर्ण परमात्मा समझते थे।
आवश्यक रूप से जान लें कि श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 16 श्लोक 23-24 के अनुसार शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करने से किसी प्रकार का सुख, गति या सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। भगवान शिव तमोगुण हैं, पूर्ण परमात्मा तो कोई अन्य ही है जिसके बारे में गीता अध्याय 15 श्लोक 17 में कहा गया है कि वही अविनाशी परमात्मा है जो सर्व लोकों में सबका धारण पोषण करता है।
अपनी प्यारी आत्माओं के उद्धार के लिए परमात्मा अपने निजधाम से चलकर प्रत्येक युग में अपनी पुण्य आत्माओं का उद्धार करने इस मृत लोक में आते हैं। चारों युगों में से सतयुग में परमेश्वर कबीर सत सुकृत नाम से आते हैं, त्रेतायुग में मुनींद्र ऋषि के नाम से आते हैं, द्वापरयुग में परमेश्वर करुणामय नाम से आते हैं और कलियुग में अपने वास्तविक नाम कबीर से अवतरित होते हैं। प्रत्येक युग में आकर, परमेश्वर को खोजने वाली, गुणयुक्त अच्छी आत्माओं को वे मिलते हैं और उन्हें वास्तविक नाममंत्र देकर उनका उद्धार करते हैं। कबीर साहेब अपनी आत्माओं को खोजते हुए अनेकों प्रयत्न करते हैं और उन्हें अपनी शरण में लेते हैं। आदरणीय गरीबदास जी महाराज ने अपनी वाणी में बताया है कि:
गोता मारूँ स्वर्ग में, जा पैठूं पाताल ।
गरीबदास खोजत फिरूं,अपने हीरे मोती लाल ।।
परमात्मा कबीर जी त्रेतायुग में मुनींद्र ऋषि के रूप में अवतरित हुए थे। मुनींद्र ऋषि के कई शिष्य थे जिनमें भगवान राम जी की सेना के दो भाई नल और नील भी सम्मिलित थे जिन्होंने समुद्र पर पुल निर्माण में अपने गुरुजी द्वारा प्रदत्त शक्ति से सहयोग दिया था। मुनींद्र ऋषि की शरण में चंद्रविजय भाट और उनके परिवार के सभी सदस्य भी थे। भाट समुदाय आरंभ से ही आजीविका के लिए राजाओं, महाराजाओं की स्तुति में गीत लिखते और गाते थे। उन्हें राजदरबार में ही आश्रय प्राप्त होता था और राजाओं को प्रसन्न रखना उनका कार्य होता था। चंद्रविजय भाट रावण के दरबार में गीत गाया करते थे।
चंद्रविजय भाट एक अत्यंत आधीन, नेक और पवित्र आत्मा के थे। अपने विधान के अनुसार मुनींद्र ऋषि एक दिन अपनी आत्माओं के कल्याण हेतु एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। जैसे ही चंद्रविजय भाट की दृष्टि उन साधु पर पड़ी वे गदगद हो उठे। परमेश्वर को चाहने वाली आत्माएं साधु संत देखकर और ईश्वर की कथा सुनकर विशेष आह्लादित हो जाती ही हैं।
कबीर साहेब ने वाणी में स्पष्ट रूप से कहा है -
साधु दर्शन राम का ,मुख पर बसे सुहाग।
दर्श उन्हीं को होत हैं जिनके पूर्ण भाग।।कबीर दर्शन संत के परमात्मा आवै याद।
लेखे में वाही घड़ी बाकी दिन बरबाद।।
चंद्रविजय भाट, मुनींद्र ऋषि रूप में परमात्मा को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि जी के सम्मुख जाकर उन्हें प्रणाम किया और उनसे अपने घर चलने और सेवा का अवसर देने का अनुरोध किया। मुनींद्र ऋषि ने उन्हें तत्वज्ञान समझाया और अपनी शरण में लिया। चंद्रविजय भाट सहित धीरे धीरे उस परिवार के 15 परिजनों को भी मुनींद्र ऋषि ने तत्वज्ञान दिया था। चंद्रविजय भाट की पत्नी कर्मवती रावण की पत्नी रानी मंदोदरी का मनोरंजन किया करती थी। किंतु मुनींद्र ऋषि की शरण में आने के पश्चात एकाएक कर्मवती के बेहूदे चुटकलों और मनोरंजन का स्थान उच्च कोटि के विचारों एवं बातों ने ले लिया। कर्मवती के मुख से ऐसा तत्वज्ञान सुनकर रानी मंदोदरी ने इस आश्चर्यजनक परिवर्तन का कारण पूछा। तब कर्मवती ने अपने गुरुजी मुनींद्र ऋषि के विषय में बताया जिससे रानी मंदोदरी अत्यंत प्रभावित हुई। रानी मंदोदरी ने उस तत्वज्ञान को सुनकर मुनींद्र ऋषि से नामदीक्षा ली और उनकी शरण में आ गई।
रानी मंदोदरी ने राजा रावण को अनेकों बार यह तत्वज्ञान समझाने का प्रयत्न किया एवं उसे उसके कुटिल इरादों के प्रति आगाह किया। किंतु रावण ने अहंकारवश उसे सुनने से मना कर दिया और अपनी मनमानी शास्त्र विरुद्ध साधना ही करता रहा।
रानी मंदोदरी ने मुनींद्र ऋषि द्वारा प्रदत्त तत्वज्ञान को अपने देवर विभीषण को भी सुनाया। विभीषण इस ज्ञान से अत्यंत प्रभावित हुआ और उसने भी मुनींद्र ऋषि की शरण ग्रहण की।
रामायण की कथा सुनकर दो विशेष प्रश्न सभी के भीतर उठते हैं कि:
किंतु अब यह सच्चाई सबके समक्ष है कि स्वयं मुनींद्र ऋषि रूप में आए परमात्मा द्वारा दिए गए तत्वज्ञान का ही यह प्रभाव था कि राक्षसों के बीच रहते हुए भी वे दोनों धर्म से जुड़े रहे। तत्वज्ञान के प्रभाव से ही व्यक्ति आधीन, नम्र और नेक आचरण रखता है।
भगवान राम द्वारा लंकापति रावण के वध के पश्चात् लंका की राजगद्दी पर विभीषण बैठे। विभीषण का राज्याभिषेक भगवान राम द्वारा किया गया। विभीषण ने हजारों वर्षों तक लंका में सुख व शांति से राज्य किया तथा मृत्यु के पश्चात विभीषण मोक्ष प्राप्ति कर विमान में बैठकर निजधाम सतलोक को गए। विभीषण की तरह ही, रानी मंदोदरी, चंद्रविजय भाट, कर्मवती और उनके परिवार के अन्य सदस्य तथा लंका के वे लोग जिन्होंने संत मुनींद्र ऋषि की शरण ग्रहण की थी वे भी मृत्योपरांत विमानों में बैठकर सतलोक को गए थे। कबीर साहेब जी कहते हैंः
जे तुझे राज पाट भी चाहिए, हमरा धर ले ध्यान।
विभीषण ने पूर्ण परमेश्वर द्वारा बताई शास्त्रानुसार सत्यभक्ति की जिसके फलस्वरूप उसने इस लोक में भी राज्य और सुख प्राप्त किया तथा सतलोक प्रस्थान कर मोक्ष प्राप्त किया।
रामायण की कथा से ये भी विदित है की रावण को मारने के लिए श्री राम ने अनेकों प्रयत्न किए थे किंतु सभी प्रयास विफल रहे। अंत में कबीर कृपा से रावण का वध हुआ। रावण भगवान तमगुण प्रधान भगवान शिव का पुजारी था। ऐसा शास्त्रों में प्रमाण है कि वह तमगुण की साधना किया करता था।
रावण ने शिवभक्ति से स्वर्ण लंका प्राप्त की थी। वह अथाह संपत्ति का स्वामी था। किन्तु यहाँ से मृत्यु के बाद जाते समय वह केवल खाली हाथ गया। इतना बड़ा उपासक होने के बाद भी वह यहां से एक ढेला भी साथ नहीं ले जा सका। रावण को अपनी स्वर्ण लंका, संपत्ति, बल और बड़े कुल का अत्यंत अहंकार था। इसे कबीर साहेब जी अपनी वाणी में कहते हैंः
कबीर, सर्व सोने की लंका थी, वो रावण से रणधीरं ।
एक पलक मे राज विराजै, जम के पड़े जंजीरं ।।
रावण तमगुम शिव जी का उपासक था। रजगुण, सतगुण, तमगुण के उपासक केवल काल के जाल में फंसकर रह जाते हैं। श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में स्पष्ट किया है कि माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है वे मनुष्यों में नीच, मूढ़ और दूषित कर्म करने वाले लोग त्रिगुणमयी मेरी माया की भक्ति करते हैं। ये लोग काल भगवान को भी नहीं भजते। तीन गुणों की भक्ति करने वालों को स्वर्ग लोक प्राप्ति हो सकती है, सिद्धियां मिल सकती हैं किंतु अंततः चौरासी लाख योनियों में ही जाना पड़ेगा। रावण की भी इसी प्रकार दुर्गति हुई। ना तो उसे माया मिल सकी और ना ही मोक्ष प्राप्ति हुई। जबकि दास भाव से सत्यभक्ति करने वाले विभीषण को इस लोक की माया और सुख मिले और मरने पर मोक्ष की प्राप्ति भी हुई।
रावण राक्षसी प्रवृत्ति का अहंकारी व्यक्ति था किंतु विद्वान बहुत था। लेकिन तमोगुणी शिव की उपासना से उसे मोक्ष प्राप्ति नहीं हो सकी। तीन गुणों की भक्ति करने से कभी मोक्ष प्राप्ति नहीं हो सकती। कबीर साहेब कहते हैंः
मर्द गर्द में मिल गए, रावण से रणधीरं।
कंश, केश, चाणूर से, हिरनाकुश बलबीर।।
श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 7 के श्लोक 16 से 18 में गीता ज्ञानदाता काल ब्रह्म ने अपने भक्तों तथा अपनी साधना से होने वाली गति की जानकारी दी है। कहा है कि मेरी भक्ति चार प्रकार के भक्त करते हैं:- 1. आर्त 2. अर्थार्थी 3. जिज्ञासु 4. ज्ञानी। इनमें से ज्ञानी उत्तम है, मुझे प्रिय है क्योंकि वह अन्य देवताओं की भक्ति नहीं करता। केवल मुझ ब्रह्म की भक्ति करता है। परंतु तत्वज्ञान के अभाव से वे उदार ज्ञानी आत्मा भी मेरी अनुत्तम यानि घटिया गति (मोक्ष) में ही स्थित है क्योंकि गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 4 श्लोक 5, अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 10 श्लोक 2 में कहा है कि मैं नाशवान हूँ क्योंकि मेरा भी जन्म-मरण होता है। जिस कारण से साधक का भी जन्म-मरण सदा रहेगा। इसलिए गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में अपने से अन्य परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है तथा कहा है कि उसी परमेश्वर की कृपा से तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम (शाश्वतम् स्थानम्) को प्राप्त होगा। विचार करें कि जब तक जन्म-मरण है, तब तक जीव को शांति नहीं हो सकती। कर्मों का कष्ट सदा बना रहेगा। जब जन्म-मरण सदा के लिए समाप्त हो जाएगा, तब ही परम शांति प्राप्त होती है। सनातन परमधाम तो केवल सतलोक ही है क्योंकि गीता अध्याय 8 श्लोक 16 के अनुसार ब्रह्मलोकपर्यंत सर्व लोक पुनरावृत्ति में हैं।
विभीषण में जो दास्य भाव (दास भाव) था उसके कारण ही वह मुक्ति को प्राप्त हुआ। आधीन भाव से ही साधक परमात्मा को रिझा सकता है। परमात्मा को लेश मात्र भी अहंकार पसंद नही हैं। कोई भी साधक चाहे कितनी ही भक्ति, सिमरन, दान, धर्म करता रहे जब तक उसमें आधीनता, दास्य भाव और विनम्रता नहीं आती वह परमेश्वर को प्रिय नहीं हो सकता। साधक की साधना तभी सफल हो सकती है जब वह विनम्र हो आधीन भाव रखे। इसके विषय में आदरणीय संत गरीबदास जी महाराज ने बहुत सुंदर वाणी अपने मुखकमल से उच्चारित की है। इस वाणी में वे विभीषण और रावण दोनों का नाम लेते हैं।
गरीब, आधीनी के पास है पूर्ण ब्रह्म दयाल।
मान बड़ाई मारिए बे अदबी सिरकाल।।
दासा तन में दर्श है सब का होजा दास।
हनुमान का हेत ले रामचन्द्र के पास।।
विभिषण का भाग बड़ेरा, दास भाव आया तिस नेड़ा।।
दास भाव आया बिसवे बीसा, जाकूं लंक देई बकशीशा।।
दास भाव बिन रावण रोया, लंक गंवाई कुल बिगोया।।
भक्ति करी किया अभिमाना, रावण समूल गया जग जाना।।
ऐसा दास भाव है भाई। लंक बखसते बार ना लाई।।
तातें दास भाव कर भक्ति कीजै, सबही लाभ प्राप्त कीजै।।
गरीब बेअदबी भावै नहीं साहब के तांही।
अजाजील की बन्दगी पल मांहे बहाई।।
अर्थ :- गरीबदास जी महराज अपनी अमृतवाणी में कहते हैं कि जो साधक आधीन है अर्थात विनम्र है परमात्मा उसके निकट है। जो साधक अहंकार युक्त है तो उसकी साधना विफल हो जाती है। दास भाव से भक्ति संभव है। हनुमान जी दास भाव से श्री राम जी के साथ रहते थे जिस कारण उन्होंने श्री राम जी के परमभक्त के रूप में स्थान पाया। रावण ने तमगुण उपासना की और अहंकार भी रखा जिस कारण से राज्य और कुल दोनों का नाश हुआ। जबकि विभीषण के विनम्र भक्ति भाव के कारण परमात्मा ने उसे लंका का राज्य बख्शा। परमात्मा आधीन दास को कुछ भी बख्शने में देर नहीं लगाते। परमात्मा को बेअदबी बिल्कुल पसंद नहीं इसी कारण अजाजील नाम के एक साधक जिसने ग्यारह अरब प्रणाम यज्ञों का फल इकट्ठा कर रखा था उसकी भक्ति को उसके अहंकार के कारण परमात्मा ने नष्ट कर दिया।
इसी प्रकार अपने आधीन भाव और दास भाव के कारण ही विभीषण ने इस लोक में राज्य सुख प्राप्त किया और मृत्यु के पश्चात मोक्ष भी।
गरीबदास जी महाराज ने भक्त विभीषण के प्रतिज्ञापालन अर्थात वफादारी की प्रशंसा अपनी वाणी में की है। अमरग्रंथ साहेब के "सुकर्मी पतिव्रता का अंग" में यह संकलित है। जिसमें विभीषण के दास्य भाव और प्रतिज्ञापालन की प्रशंसा करते हुए गरीबदास जी महराज ने सर्व कार्य करके ईश्वर को सौंप देना श्रेयस्कर बताया है। अहंकारी रावण के अहम के कारण उसके दस सिर भी गए और राज्य भी जबकि विनम्र विभीषण के दास्य भाव के चलते उसे सारी लंका का राज्य मिला।
कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ है, निरंजन (ब्रह्म) वाकि डार। तीनों देवा शाखा हैं, पात रूप संसार।।
कबीर, हम ही अलख अल्लाह हैं, मूल रूप करतार। अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड का, मैं ही सिरजनहार।।
परमात्मा केवल एक कबीर साहेब हैं जिन्हें वेदों में कविर्देव कहा है। कबीर साहेब ही सर्व सृष्टि के रचनहार हैं। वे सबके पालक, संरक्षक, कर्ता और पिता हैं। उनकी शक्ति असीमित है। कबीर साहेब सर्व आत्माओं के जनक हैं। केवल पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही पूजा योग्य हैं, भक्ति योग्य हैं, उनके समकक्ष कोई भी नहीं है। वे सर्वशक्तिमान, अविनाशी परमेश्वर हैं। केवल कबीर साहेब की शक्ति असीमित है जबकि अन्य सभी देवताओं की शक्तियां सीमित हैं। अक्षर पुरुष 7 संख ब्रह्मांडों का स्वामी है। क्षर पुरुष 21 ब्रह्मांड का स्वामी है जिसके संचालन का भार उसने रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु और तमगुण शिव जी पर सौंप रखा है। किंतु सर्व शक्ति परमात्मा कबीर जी से ही संचालित होती है। इसका प्रमाण उल्टे लटके वृक्ष के उदाहरण के रूप में श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 2 के मध्य स्पष्ट किया है। परमात्मा कबीर साहेब ने कहा हैः
कबीर, एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय।
माली सीचैं मूल को, फूलै-फलै अघाय।।
अर्थ : - एक मूल रूपी भगवान की साधना करने से सभी अन्य देव अपना फल साधक को देते हैं। किंतु मूल के अतिरिक्त यदि वृक्ष के अन्य भागों की साधना की जाए तो सर्वस्व नष्ट हो जाता है।
अहंकार की भावना रखने वाले व्यक्ति कभी-कभी अपनी आत्मा के अद्वितीय स्वरूप को नहीं समझ पाते हैं, जबकि विनम्र भाव से उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। अहंकार की भावना रखने वाले साधक कितना भी भक्ति करें, परमात्मा को नहीं पा सकते, जबकि विनम्र भाव से साधक को परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है। उदाहरण से स्पष्ट है कि विभीषण आधीन और विनम्र भाव से परमात्मा के प्रिय हुए और उन्हें इस लोक का सुख और परलोक का सुख दोनों सहज ही प्राप्त हुए जबकि रावण के अहंकार ने उससे उसकी साधना और भक्ति से प्राप्त स्वर्ण राज्य भी छुटवा दिया, उसका कुल नष्ट हुआ और वह चौरासी लाख योनियों में गया।
आधीन और नम्र भक्त ही परमात्मा को प्रिय है। अहंकार से परमात्मा दूर रहते हैं। जहां अहंकार है वहां परमात्मा नहीं हैं। विभीषण की गति त्रेतायुग में मुनींद्र ऋषि के तत्वज्ञान और बताई गई भक्ति विधि करने से हुई। आज वर्तमान समय में पूर्ण परमेश्वर कबीर साहेब जी संत रामपाल जी महाराज जी के अवतार रूप में हमारे समक्ष हैं। वर्तमान में केवल संत रामपाल जी महाराज जी एकमात्र तत्वदर्शी संत हैं जिनसे नाम उपदेश लेकर आत्म कल्याण संभव है। इस लोक के सर्व सुख और मोक्ष तभी प्राप्त हो सकता है जब तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी से नामदीक्षा लेकर सत्यभक्ति की जाए। तत्वज्ञान समझें और परमात्मा की शरण में शीघ्र आएं।
विभीषण जी त्रेता युग में एक धर्मपरायण आत्मा और महान भक्त हुए थे। वे पुलस्त्य वंश के ब्राह्मण ऋषि विश्रवा जी और राक्षसी कैकेसी जी के सबसे छोटे पुत्र थे। लेकिन राक्षस जाति से संबंधित होने के बावजूद भी विभीषण जी को अपने ब्राह्मण पिता से धार्मिकता और अच्छे गुण विरासत में मिले थे। उनके हृदय में ईश्वर और भक्ति के लिए गहरी आस्था थी।
विभीषण जी को परमेश्वर कबीर जी ने ऋषि मुनीन्द्र के रुप में मार्गदर्शन प्रदान किया था। इस तरह वह कबीर साहेब जी की शरण में आए थे। फिर उन्होंने विभीषण जी को सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष मंत्र प्रदान किया। इस तरह उनका कल्याण हुआ।
रामायण में यह प्रमाण है कि रावण की हार और मृत्यु हो गई थी। उसके बाद श्री राम जी ने विभीषण जी को लंका के राजा के रूप में ताज पहनाया था क्योंकि विभीषण जी परमेश्वर कबीर जी के सच्चे भक्त और बहुत ही विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने विनम्र स्वभाव, दास भाव, सत्यता के आधार पर और परमेश्वर से डर कर सच्चे हृदय से लंका पर शासन किया था।
रावण बहुत ही विद्वान ब्राह्मण था। वह भगवान शंकर जी की पूजा किया करता था। लेकिन अपने अहंकार के कारण अंत में उसकी भयंकर मृत्यु हुई। ना तो उसे माया मिल सकी और ना ही मोक्ष की प्राप्ति हुई। रावण के अंहकार और तमोगुणी शिव की उपासना करने के कारण ही उसकी ऐसी दुर्गति हुई।
पूरे विश्व में एकमात्र संत रामपाल जी महाराज जी ही तत्वदर्शी संत हैं। केवल वे ही सतपुरुष कबीर साहेब जी के अवतार हैं जो सच्चे मोक्ष मंत्र प्रदान करने के अधिकारी संत भी हैं। मनुष्य को जीवन सतभक्ति करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए मिला है। सतभक्ति प्राप्त करने के लिए सभी मनुष्यों को तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा लेकर अपना कल्याण करवाना चाहिए।
यदि उपरोक्त सामग्री के संबंध में आपके कोई प्रश्न या सुझावहैं, तो कृपया हमें [email protected] पर ईमेल करें, हम इसे प्रमाण के साथ हल करने का प्रयास करेंगे।
Bhavesh Patel
इस लेख में विभीषण के आध्यात्मिक जीवन के बारे में बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है। इसमें सच्ची भक्ति और विनम्र भाव के बारे में बहुत गहराई से बताया गया है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि विभीषण और रावण की पूजा में इतना अंतर क्यों था?
Satlok Ashram
भावेश जी, आप जी ने हमारे लेख को पढ़कर अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, उसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। यह बात सच है कि विभीषण जी की अमर कथा में सच्ची भक्ति का महत्त्व बताया गया है। विभीषण जी की भक्ति रावण से इसलिए भी भिन्न थी क्योंकि वह कबीर साहेब जी की शरण में था, उनका शिष्य था और उनके द्वारा बताई भक्ति किया करता था। जबकि रावण भगवान तमोगुणी शिव जी की पूजा किया करता था। रजगुण, सतगुण, तमगुण के उपासक केवल काल के जाल में फंसकर रह जाते हैं। श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में स्पष्ट किया है कि माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है वे मनुष्यों में नीच, मूढ़ और दूषित कर्म करने वाले लोग त्रिगुणमयी मेरी माया की भक्ति करते हैं। देखिए मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य केवल सच्चे संत से नाम दीक्षा लेकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करना है। वर्तमान में कबीर साहेब जी संत रामपाल जी महाराज जी के रूप में आए हुए हैं। केवल वे ही हमारे पवित्र शास्त्रों के अनुकूल भक्ति बता रहे हैं और सच्चे मोक्ष मंत्र प्रदान कर रहे हैं। हम आप जी से निवेदन करते हैं कि आप संत रामपाल जी महाराज जी के आध्यात्मिक प्रवचनों को यूट्यूब चैनल पर सुनिए और गहराई से उनका अध्ययन कीजिए और आप आध्यात्मिक पुस्तक ‘ज्ञान गंगा’ भी पढ़ सकते हैं।