ऋषिमना य ऋषिकृत् स्वर्षाः सहòाणीथः पदवीः कवीनाम्। तृतीयम् धाम महिषः सिषा सन्त् सोमः विराजमानु राजति स्टुप्।।
अनुवाद - वेद बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि (य) जो पूर्ण परमात्मा विलक्षण बच्चे के रूप में आकर (कवीनाम्) प्रसिद्ध कवियों की (पदवीः) उपाधी प्राप्त करके अर्थात् एक संत या ऋषि की भूमिका करता है उस (ऋषिकृत्) संत रूप में प्रकट हुए प्रभु द्वारा रची (सहòाणीथः) हजारों वाणी (ऋषिमना) संत स्वभाव वाले व्यक्तियों अर्थात् भक्तों के लिए (स्वर्षाः) स्वर्ग तुल्य आनन्द दायक होती हैं। (सोम) वह अमर पुरुष अर्थात् सतपुरुष (तृतीया) तीसरे (धाम) मुक्ति लोक अर्थात् सत्यलोक की (महिषः) सुदृढ़ पृथ्वी को (सिषा) स्थापित करके (अनु) पश्चात् (सन्त्) मानव सदृश संत रूप में (स्टुप्) गुबंद अर्थात् गुम्बज में उच्चे टिले जैसे सिंहासन पर (विराजमनु राजति) उज्जवल स्थूल आकार में अर्थात् मानव सदृश तेजोमय शरीर में विराजमान है।
भावार्थ - मंत्र 17 में कहा है कि कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर् ही है। उसके द्वारा रची अमृतवाणी कबीर वाणी (कविर्वाणी) कही जाती है, जो भक्तों के लिए स्वर्ग तुल्य सुखदाई होती है। वही परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके तेजोमय मानव सदृश शरीर में आकार में गुबन्द में सिंहासन पर विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। जैसे एक ब्रह्म का लोक जो इक्कीस ब्रह्मण्ड का क्षेत्र है, दूसरा परब्रह्म का लोक जो सात संख ब्रह्मण्ड का क्षेत्र है, तीसरा परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् पूर्ण ब्रह्म का सतलोक है जो असंख्य ब्रह्मण्डों का क्षेत्र है। क्योंकि पूर्ण परमात्मा ने सत्यलोक में सत्यपुरूष रूप में विराजमान होकर नीचे के लोकों की रचना की है। इसलिए नीचे गणना की गई।
देखिए, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही है। उसके द्वारा रची अमृतवाणी कबीर वाणी (कविर्वाणी) कही जाती है, जो भक्तों के लिए स्वर्ग तुल्य सुखदाई होती है। वही परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके तेजोमय मानव सदृश शरीर के आकार में गुम्बद में सिंहासन पर विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही सबसे शक्तिशाली भगवान हैं क्योंकि उन्होंने ही अन्य सर्व की रचना की।
देखिए, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव ने तीसरे मुक्ति धाम सतलोक की स्थापना की और तेजोमय मानव सदृश शरीर के आकार में वहीं गुम्बद में सिंहासन पर विराजमान हुए। परमेश्वर ने ब्रह्म का इक्कीस ब्रह्माण्ड का लोक बनाया और परब्रह्म का सात संख ब्रह्माण्ड का क्षेत्र भी बनाया। सभी देवी देवता काल ब्रह्म के इक्कीस ब्रह्माण्डों में रहते हैं।
देखिए, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 में कहा है कि कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे ऋषि, सन्त व कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही है। उसके द्वारा रची अमृतवाणी कबीर वाणी (कविर्वाणी) कही जाती है, जो भक्तों के लिए स्वर्ग तुल्य सुखदाई होती है। वही परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके तेजोमय मानव सदृश शरीर आकार में गुम्बद में सिंहासन पर विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही सबसे शक्तिशाली भगवान हैं क्योंकि उन्होंने ही सभी आत्माओं, ब्रह्माण्डों, काल ब्रह्म सदाशिव और देवी दुर्गा सहित सभी को बनाया। इसलिए पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही सबसे शक्तिशाली भगवान हैं।
देखिए, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 के अनुसार परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके तेजोमय मानव सदृश शरीर आकार में गुम्बद में सिंहासन पर विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही सबसे शक्तिशाली भगवान हैं क्योंकि उन्होंने ही अन्य सर्व की रचना की। पूर्ण परमात्मा कविर्देव ने ही सभी आत्माओं, ब्रह्माण्डों, काल ब्रह्म सदाशिव और देवी दुर्गा सहित सभी को बनाया। इसलिए पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही भगवान शिव के पिता भी हैं।
स्वयंभू परमात्मा है, सर्व को वचन से प्रकट करने वाला है। ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 के अनुसार परमात्मा तीसरे मुक्ति धाम अर्थात् सत्यलोक की स्थापना करके तेजोमय मानव सदृश शरीर में आकार में गुम्बद में सिंहासन पर विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही सबसे शक्तिशाली भगवान हैं क्योंकि उन्होंने ही अन्य सर्व की रचना की। पूर्ण परमात्मा कविर्देव ने ही सभी आत्माओं, ब्रह्माण्डों, काल ब्रह्म सदाशिव और देवी दुर्गा सहित सभी को बनाया। इसलिए पूर्ण परमात्मा कविर्देव ही सब के पिता भी हैं। कबीर भगवान के कोई पिता नहीं है, वह खुद ही अपनी वास्तविक जानकारी देते हैं।
देखिए, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव तीसरे मुक्ति धाम सतलोक की स्थापना की और तेजोमय मानव सदृश शरीर के आकार में वहीं गुम्बद में सिंहासन पर विराजमान हुए। परमेश्वर ने ब्रह्म का इक्कीस ब्रह्माण्ड का लोक बनाया और परब्रह्म का सात संख ब्रह्माण्ड का क्षेत्र भी बनाया। सतलोक अजर अमर है और परमेश्वर कबीर ही प्रथम एवं अमर भगवान हैं। उनके अतिरिक्त सभी कुछ का क्षय होने वाला है।
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Pushpa Yadav
स्वर्ग ईश्वर का निवास स्थान है?
Satlok Ashram
देखिए, ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18 में कहा है कि पूर्ण परमात्मा कविर्देव तीसरे मुक्ति धाम की स्थापना करके तेजोमय मानव सदृश शरीर के आकार में गुबन्द में सिंहासन पर विराजमान है। इस मंत्र में तीसरा धाम सतलोक को कहा है। पहला लोक ब्रह्म का इक्कीस ब्रह्माण्ड का क्षेत्र है, दूसरा लोक परब्रह्म का सात संख ब्रह्माण्ड का क्षेत्र है, तीसरा परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् पूर्ण ब्रह्म का सतलोक है जो असंख्य ब्रह्माण्डों का क्षेत्र है। पूर्ण परमात्मा ने सतलोक में सत्यपुरूष रूप में विराजमान होकर नीचे के लोकों की रचना की है। स्वर्ग ब्रह्म के पहले लोक में ही विधमान है जो सतलोक से बहुत नीचे है और ईश्वर का निवास स्थान नहीं है।